श्रम विभाजन और जाति प्रथा, subjective question and answer, lesson- 1,hindi class 10,2022

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 1.श्रम विभाजन और जाति प्रथा


 - (भीमराव अंबेडकर)

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बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 ई में मध्यप्रदेश के महू में एक दलित परिवार में हुआ था , उनकी मृत्यु  दिसंबर 1956 में दिल्ली में हो गया । प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ौदा के राजा के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयार्क चले गए और उसके बाद लंदन गये |
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के जीवन में तीन व्यक्तियों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा
  • -बुद्ध
  • -कबीर
  • -ज्योतिबा फुले
भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माता के रूप में जाना जाता है संविधान निर्माण के लिए प्रारूप समिति का निर्माण किया गया था ,जिसमें कुल 7 सदस्य थे इस समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर थे!
प्रारूप समिति के सदस्य थे:
  1. डॉ बी. आर. अम्बेडकर।
  2. अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर।
  3. कनैयालाल माणिकलाल मुंशी।
  4. मोहम्मद सादुल्ला।
  5. एन गोपालस्वामी अय्यंगर।
  6. बी. एल. मिटर।
  7. डी.पी. खेतान।
बाबा साहेब की प्रमुख रचनाएं:-
  • द कस्ट्स इन इंडिया: देयर मेकैनिज्म
  • जेनेसिस एंड डेवलपमेंट
  • द अनटचेबल्स
  • हु आर दे
  • हू आर शुद्रास
  • बुद्धिस्म एंड कम्युनिज्म
  • बुद्ध एंड हिस धम्मा
  • थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स
  • द राइज एंड फॉल ऑफ द हिंदू वीमेन
  • एनीहिलेशन ऑफ कास्ट
प्रस्तुत पाठ श्रम विभाजन और जाति प्रथा बाबासाहेब के विख्यात भाषण (1936)एनीहिलेशन ऑफ कास्ट के हिंदी अनुवाद जातिभेद का उच्छेद से लिया गया है ,जिसका  हिंदी अनुवाद ललई सिंह यादव ने किया ।

प्रश्नोत्तरी :-

1.लेखक किस विडंबना की बात करते हैं ? विडंबना का स्वरूप क्या है ?
Ans:- लेखक जिस विडंबना की बात करते हैं वह है जातिवाद ,उनका कहना है कि आजकल आधुनिक युग में भी जाति प्रथा के पोशाकों की समाज में कमी नहीं है। विडंबना का स्वरूप बहुत ही विशाल है आधुनिक समाज भी कार्यकुशलता के लिए श्रम विभाजन के आधार के रूप में जाति प्रथा को ही  मानते हैं।
2.जातिवाद के पोषक उसके पक्ष में क्या तर्क देते हैं ?
Ans:- जातिवाद के पोषक इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं कार्यकुशलता के लिए श्रम विभाजन आवश्यक है चुकी जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है! 

3.जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक की प्रमुख आपत्तियां क्या है?
Ans:- लेखक की प्रमुख आपत्तियां निम्नलिखित हैं -
जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए हैं जो बहुत ही आपत्तिजनक बात है
चुकि एक कुशल व्यक्ति सक्षम श्रमिक समाज का निर्माण करने के लिए आवश्यक होता है कोई व्यक्ति कुशल तब तक नहीं होता जब तक कि उसे अपनी रूचि के हिसाब से काम न मिले और जाति प्रथा रूचि के आधार पर श्रम विभाजन करता ही नहीं है
जाति प्रथा पेशे का एक दोषपूर्ण निर्धारण है साथ ही मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पैसे में बांध देती है भले ही पैसा अपर्याप्त होने के कारण मनुष्य को भूखे मरने की कगार पर ला दे
जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बन गई है ! 

4.जातिवाद भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती है ?
Ans:- जाति प्रथा को श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं कहीं जा सकती है क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है । चुकि एक कुशल व्यक्ति सक्षम श्रमिक समाज का निर्माण करने के लिए आवश्यक होता है कोई व्यक्ति कुशल तब तक नहीं होता जब तक कि उसे अपनी रूचि के हिसाब से काम न मिले और जाति प्रथा रूचि के आधार पर श्रम विभाजन करता ही नहीं है।

5.जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है ?
Ans:- जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बन गई है क्योंकि क्योंकि जाति प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बांध कर रखती है , आजकल उद्योग धंधों की प्रक्रिया तथा तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अचानक परिवर्तन हो जाता है जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पर सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता ना हो तो उसके लिए भूखों मरने के अलावा कोई चारा नहीं बचता । कभी-कभी इंसान को अपने रुचि के हिसाब से काम नहीं मिलने पर उन्हें काम में मन नहीं लगता और वह काम टालते रहते हैं या कम काम करने के लिए आदी हो जाते हैं ! इस तरह जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है

6.लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या किसे मानते हैं ,और क्यों ?
Ans:- लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या इस बात को मानते हैं कि बहुत से लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ केवल विवशतावस करते रहते हैं, ऐसी स्थिति में जहां काम करने वालों का न दिल लगता है ना ही दिमाग भला कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है।

7.लेखक ने पाठ में किन प्रमुख पहलुओं से जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है?
Ans:- लेखक के अनुसार जाति प्रथा निम्नलिखित पहलुओं से एक हानिकारक प्रथा है :-
आर्थिक पहलू से, बेरोजगारी की दृष्टि से ,
श्रम विभाजन की दृष्टि से , कार्यकुशलता की दृष्टि से, तथा एक सभ्य (आदर्श) ,स्वतंत्र समाज की दृष्टि से भी जाति प्रथा एक हानिकारक प्रथा है।

8.सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओं को आवश्यक माना है?
Ans:- सच्चे लोकतंत्र की अवस्था के लिए लेखक ने स्वतंत्रता समता तथा भ्रातृत्व जैसी विशेषताओं को आवश्यक माना है,
स्वतंत्रता- जहां सभी को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी काम को करने की स्वतंत्रता हो
समता- चाहे इंसान कोई भी काम करें समाज में उन्हें समान दृष्टि से देखा जाए
भ्रातृत्व -सभी मनुष्य भाईचारे से मिलजुल कर रहें


व्याकरण संबंधित प्रश्नोत्तरी (भाषा की बात) :-

1.निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें-

सभ्य                 -असभ्य
विभाजन           -
निश्चय               -निश्चय
ऊंच                  -नीच
स्वतंत्रता            -प्रतंत्रता
दोष                  - गुण
सजग               -
रक्षा                 -
पूर्वनिर्धारण      -


2. निम्नलिखित के पर्यायवाची शब्द लिखें
दूषित-    प्रदूषित
श्रमिक-   मजदूर
पेशा-      काम
अक्समात- अचानक
अवसर-     हमेसा
परिवर्तन-   बदलाव
सम्मान-     प्रतिष्ठा

संपूर्ण गधखंड

 

लेखक

गध

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