वर्णिका भाग 2 all story,dahi wali mangamma story pdf

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अनुक्रमणी

 

1. दही वाली मंगम्मा (कन्नड़) – श्रीनिवास

2. ढहते विश्वास ( उड़िया) – सातकोड़ी होता

3. माँ (गुजराती) – ईश्वर पेटलीकर

4. नगर (तमिल) – सुजाता

5. धरती कब तक घूमेगी (राजस्थानी ) – साँवर दइया

 

 

1………

दही वाली मंगम्मा

(श्रीनिवास)

 

श्रीनिवास जी का पूरा नाम मास्ती वेंकटेश अय्यंगार है। उनका जन्म 6 जून 1891 ई० में कोलार, कर्नाटक में हुआ था। श्रीनिवास जी का देहावसान हो चुका है। वे कन्नड़ साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित रचनाकारों में एक हैं। उन्होंने कविता, नाटक, आलोचना, जीवन चरित्र आदि साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। साहित्य अकादमी ने उनके कहानी संकलन 'सण्णा कथेगुलु' को सन् 1968 में पुरस्कृत किया । उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। यह कहानी 'कन्नड़ कहानियाँ (नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया) से साभार ली गयी है। इस कहानी का अनुवाद बी० आर० नारायण ने किया है।

 

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मंगम्मा बरसों से हमें बारी से दही दिया करती है, बेंगलूर की तरह दूसरे शहरों में रोज आकर दही देना और महीने के बाद पैसे लेने को बारी कहते हैं पर लगता कि बेंगलूर में ऐसी 1 बारों का रिवाज नहीं। आमतौर पर जब भी मंगम्मा हमारे मुहल्ले में आती तब वह हमारे घर 'आकर 'दही लोगी माँ जो बहुत बढ़िया है' कहती है। हमें आवश्यकता होती तो हम ले लेते और उस दिन के भाव के अनुसार उसके पैसे दे देते या अगले दिन चुका देते। यह हमारी उसकी बारी की रीति है वह अवलूर के पास किसी गाँव की है। उसके गाँव का नाम शायद वेंकटपुर या कुछ ऐसा ही है। आते समय हमारे मुहल्ले से होकर ही आना पड़ता है और जाती बार भी हमारी तरफ से ही जाना होता है। मैं उससे जरा अच्छी तरह बात करती हूँ। इसलिए कभी-कभी गाव से आते समय और सारा दही खत्म करके जाते समय दोनों बार मेरे पास आ जाया करती । आकर आँगन में थोड़ी देर बैठती, सबसे बातें करती । पान सुपारी खाती न रहने पर कभी कभी हमसे पान सुपारी माँगकर खाकर गाँव जाती। ऐसे मौकों पर यदि मेरे पास समय होता तो वह अपना दुख सुख भी बताया करती । मुझसे भौ सुख-दुख पूछती । मुझे भला क्या सुनाती ? यही कि बिल्ली ने दूध पी लिया, चूहे ने कुम्हड़े में छेद कर दिया। तब वह 'दुनिया ही ऐसी है' कहकर अपने अनुभव की बातें सुनाती बाद में यह भी कहती कि इस दुनिया में किस ढंग से चलना चाहिए मंगम्मा मुझे अच्छी लगती। मुझमें और उसमें बहुत घनिष्ठता हो गई । कोई एक महीने पहले की बात है। मंगम्मा ने सबेरे-सबेरे आवाज लगाई, 'दही लोगी माँ जी!" मैं भीतर कुछ कर रही थी। मेरा बेटा बोला, 'हाँ लूंगा' और पास जाकर 'दही दो' कहकर उसने हाथ फैलाया। मंगम्मा ने मटकी से थोड़ा अच्छा गाढ़ा गाढ़ा दही निकालकर उसकी हथेली पर डाल दिया और बोली, "जरा जाकर माँ जी को जल्दी से भेज दो मुझे जाना है ।" इतने में मैं आ गई। मंगम्मा बोली, "माँ जी । सोने जैसा बेटा पैदा किया है। जैसे गुण तुम्हारे हैं, वैसे ही उसे मिले हैं। पर इन सबसे क्या ? लड़के के बड़े होने की देर है । फिर तो पता नहीं कैसी बहू आएगी। अब जो बच्चा 'अम्मा अम्मा' करता पीछे-पीछे घूमता है । उसे ही यह बात पता नहीं होगा कि अम्मा जिंदा है या मर गई ?" मैंने पूछा, "मंगम्मा क्या हो गया ? बेटे ने तेरी बात नहीं मानी ?" वह फिर से बोली, "छोड़िए माँ जी, भांवरे लेकर आया, पति ही जब बात नहीं पूछता था तो बेटा क्या सुनेगा ?" इस पर मैंने पूछा, "तेरे घरवाले ने तेरी बात नहीं मानी क्या ?" वह कहने लगी, "अरे, माँ जो मेरे भाग्य में एक अच्छी धोती नहीं थी। किसी और ने पहन ली। वह साड़ी के चक्कर में उसी के पीछे लग गया जो भी हो वह समझता रहा, मेरा घर है, मेरी घरवाली है । इसीलिए मैं भी चुप रही कि घरवाला तो है। सच कहती हूँ, अमृत बेचती रही, पति खा गई। पता नहीं मेरे नसीब में क्या क्या लिखा है ? पर आपको एक बात कहती हैं, ध्यान रखिएगा। घरवाला जब घर आए तो अच्छी तरह कपड़े-लत्ते पहनकर घूमा कीजिए मर्दी का मन बड़ा चंचल होता है। उनकी पसंद की साड़ी ब्लाउज पहनकर घूमा कीजिए फूल इत्र आदि लगाकर उनके मन को बस में करना चाहिए। आपने जो साड़ी पहन रखी है, काम-धंधों के लिए ठीक है जब घर में अकेली रहती हैं, तब के लिए यह ठीक है। शाम के समय एक बढ़िया साड़ी पहनकर रहना चाहिए ।" मुझे जरा हँसी आई। लेकिन ऐसा लगा कि अनुभव से कितनी बड़ी बात कह रही है। साथ ही यह दुख भी हुआ कि उस अनुभव के पीछे दुख छिपा है । मैं बोली, "हाँ मंगम्मा, तुम्हारी बात सोलह आने सच है। बाद में मंगम्मा बोली, "देखिए माँ जी, आदमी को ढंग से बस में रखने के तीन-चार गुर हैं। कुछ लोग कहते हैं कि टोना-टोटका करो या जड़ी-बूटी खिला दो। अरे कहावत है, 'दवा करने से तो मशान ही जगता है। ऐसे लोगों की बातें नहीं सुननी चाहिए। कोई न कोई स्वाद की चीज बनाकर दीजिए। आँखों को तृप्त करने अच्छी तरह से कपड़े-लते पहन- -ओढ़कर दुखी रहने पर भी हँसकर बातें कीजिए घर के लिए जो चाहिए एक बार खूब मँगवा लीजिए, पर बार-बार मत माँगिए। पैसा-पैसा जोड़कर जरूरत पड़ने पर एक दो रुपए उन्हें थमा देना चाहिए। ये हैं सबसे बड़े टोने-टोटके घरवाली ऐसा करे 1 तो घरवाला घर में कुत्ते की तरह रहता है। अगर ऐसा न करे तो गलियों में भटकता है।" मुझे मंगम्मा की बात के चमत्कार से आश्चर्य हुआ। दो इधर-उधर की बातें करके मैंने उसे भेज दिया।

 

कोई पंद्रह दिन पहले जब मंगम्मा घर आई तो लगा कि वह बहुत दुखी है। मैंने पूछा, 'क्यों मंगम्मा ऐसी क्यों हो ?" वह बोली, "क्या बताऊँ, माँ जी ऐसा लगता है मेरी किसी को भी जरूरत नहीं ।" यह कहकर उसने अपने पल्ले से आँसू पोछे। मैंने पूछा, "क्या हुआ ? बेटे ने कुछ कह दिया ?" उसने कहा "हाँ माँ जी, कुछ ऐसा ही हो गया। बहू ने किसी बात पर पोते की खूब पिटाई कर दी। तो मैंने कहा क्यों री राक्षसी, इस छोटे से बच्चे को क्यों पीट रही है ? तो मेरे ऊपर चढ़ बैठी। खूब सुनाई उसने तब मैंने भी उससे कह दिया, मैं तेरे घरवाले को माँ है तू मुझसे इसी जवान लड़ा रही है। आने तो दे उसे ।" वह महाराजा पर आया । उससे में बोली, "देख भैया, इसने बेमतलब में अनजान बच्चे को इत्ती जोर से पीटा, मैन मना किया तो मुझे ही चार सुनाती है। तू जरा अपनी घरवाली को अकल सिखा ।" इस पर बोली, "मुझे क्या सिखाएँगे। लड़का अगर कुछ उधम करता है तो उसे मना करने का हक मुझे नहीं ? तुमने जैसे इन्हें पैदा किया वैसे ही मैंने उसे पैदा किया ? मुझे क्या अकल सिखाने चली है ?" जो भी हो माँ जी वह उसकी घरवाली है, में माँ हूँ उसे कुछ कहा तो पलटकर जवाब देती है मुझे कहे तो मैं क्या कर सकती हैं। इस पर वह बोला, "हाँ, माँ वह अपने बेटे को मारती है तो तुम क्यों उसके झगड़े में पड़ती हो। तुम मुझे दंड दो ।" तब मैंने कहा, "क्या रे । मुझसे गलती ही हुई ?" मुझे बहुत गुस्सा आया मा जी । बात मेरे मुंह से निकल ही गई 'क्या कहता है रे, बीबी ने तुझ पर जादू फेरा है वह बच्चे को पीटे तो भी ठीक है और मुझे गाली देनो भी ठीक है, बहुत अच्छे । कल वह कह दे, माँ को निकाल, तो तू निकाल बाहर करेगा ।" इस पर वह बोला, "और क्या किया जा सकता है माँ, अगर तुम यह कहो कि घरवाली रहेगी तो में नहीं रहती और में रहेंगी तो घरवाली नहीं रह सकती तो उस बेचारी को सहारा काम दे ३" मैंने पूछा, "मुझ बेसहारा का क्या बनेगा ?" तब उसने कहा, "तुम्हारा क्या है माँ तुम्हारे पास गाय-बैल है, पैसा है, तुम्हें क्या मैं पाल सकता हूँ ?" मैंने पूछा, "तुम्हारा कहना है कि में अलग हो जाऊँ ?" इस पर उसने साफ कह दिया, "तुम्हारी मर्जी । अगर तुम अलग होना चाहती हो तो रोकूंगा नहीं मैं तुम्हारे झगड़ों से तंग आ गया हूँ इस पर मैंने कहा, "अच्छी बात है बेटा !

 

आज दोपहर से में अलग हो जाती हूँ तुम अपनी घरवाली के साथ सुख से रहो।" फिर दही लेकर चली आई माँ जी मैंने दही लेकर उसे पैसे दिए और कहा, "जाने दो मंगम्मा घर जाओ, ठीक से रहो. सब अपने आप ठीक हो जाएगा....।"

 

अगले दिन मंगम्मा आई तो पिछले दिन जैसा दुखी नहीं दिख रही थी। लेकिन मन पहले की तरह हल्का नहीं था। मैंने पूछा, "झगड़ा निबट गया कि नहीं ?" इस पर उसने जवाब दिया, 'वह निबटने देगी क्या ? कल दही बेचकर गई तो मेरे बर्तन भांड अलग रख दिए थे। एक कुठले में रागी और एक में चावल, थोड़ा सा नमक मिर्च सब एक तरफ रखकर, खुद खाकर और अपने पति को खिलाकर पाँव पसारे बैठी थी। आप बताइए माँ जी, झगड़ा कैसे निबटेगा ? मैंने थोड़ा हिट्ट बनाकर खाया। शादी के बाद बेटा कभी अपना रहता है माँ जी ? ठीक है, जब उन्हें नहीं चाहिए, मैं ही क्यों जबर्दस्ती करू ? अलग ही रहने लगी माँ जी ! रोज उस बच्चे को थोड़ा-सा दहीं देकर बाद में बेचने आया करती थी। आज ठीक उसी समय, वह उसे बच्चे का लेकर कहीं चली गई थी। मैं जानती हूँ कि उसकी यह चाल है कि मैं उस बच्चे से बात न कर पार्क इतनी छोटी सी बात की कैसी रामायण बनती जा रही है, मुझे आश्चर्य हुआ, पर मैं इसमें कुछ कर नहीं सकती थी। इधर-उधर की कुछ बातें करके मैने मम्मा को विदा किया। चाद में दो-एक दिन मैंने वह बात उठाई ही नहीं ऐसा लगा कि वह अलग ही रहने लगी है। एक दिन उसी ने पूछा, "माँ जी आप जो मखमल पहनती हैं न, वह कैसे राज मिलती रहे ?" मैंने पूछा, "क्यों मंगम्मा ३" तो वह बाली, "इतने दिन तो बेटे और पोत के लिए पैसा-पैसा जोड़ती रही। अब भला क्यों जोड़े में भी एक मखमल की ब्लाउज पहनूंगी ?" मैने कहा, "एक ब्लाउज के सात-आठ रुपए लगते हैं, मंगस्मा " उस दिन मगम्मा ने जाकर दर्जी से वह कपड़ा लिया और वहीं सिलने दे दिया। दूसरे दिन पहनकर आई। मुझसे कहने लगी, "देखिए माँ जी मेरा सिंगार घरवाले के रहते एक अच्छी साड़ी नसीब नहीं हुई। यह तो किसी के पीछे लगा था। मैन चेट के लिए पैसे जाई, अब वह लड़का ऐसा हो गया। अब कैसा है, मेरा सिंगार ?" मुझे लगा कि बेटे से अलग होने के कारण दुख से मंगम्मा को जरा मतिभ्रम हो गया | जब ज्यादा दुख आ जाता है तब हर किसी को ऐसा ही हो जाता है। मैंने कुछ न कहा पर सोचा इस जाकिट के कारण उसे किसी दूसरे से झगडा मोल लेना पड़ेगा। उनके गाँव का एक लड़का बेंगलूर में पढ़ रहा था। यह फिरोगियों की तरह अथवा पद्-लिखे हम जैसों की तरह, जरा नफासत से कालर टाई पहनता था, जरा शौकीन था। उसने एक दिन मंगम्मा को देखकर पूछा, "क्या बात है अम्मा, एकदम मखमल की जाकिट ही पहन ली ? तब मंगम्मा ने कहा, "क्या र लड़क, ग्रां बढ़-चढ़कर बातें कर रहा है ? तू गले में फाँसी लटकाए घूमता है मैं जाकिट नहीं पहन सकती ।" दोनों में तू तू मैं मैं हो गई। पास खड़े चार लोग हँस पड़े ।

 

अगले दिन मंगम्मा ने ही यह बात मुझे सुनाई । दूसरों की बात तो दूर उस बहू ने भी मंगम्मा को सुनाते हुए कहा था, "बहू को एक जाकिट सिलाकर नहीं दी मास अलग हो गई और अब मखमल की जाकिट पहनने लगी है। मंगम्मा ने व्याह में वह को कर्णफूल, कड़े, झुमकी, कान को जंजीर, कंठी और तगड़ी... सब दिया था। बाद में भी साल के साल कोई न कोई गहना बनवा देती थी। वह तो वह को याद नहीं रहा। मंगम्मा उसकी बात सुनकर एक दो बार तो चुप रही, बाद में वह अपने को रोक न पाई। एक दिन रात को जाकर बेटे से कह दिया, "तेरी घरवाली बड़ी-बड़ी बात बनाती है । मेरे जाकिट पर ताने करती है। कहती हैं, मैंने उसे कुछ भी नहीं दिया, क्या मैंने कुछ नहीं दिया ? कड़े, कर्णफूल, झुमकी, पदक क्या यह सब मेरे दिए हुए नहीं ?" बहू ने पति को बोलने का मौका ही नहीं दिया, वही बोली, "अब तो घरवाला भी नहीं, ऊपर से बुढ़िया भी हो गई हो। अब कर्णफूल और तगड़ी पहनोगी ? ले जाओ पहन लो। बैठे पति ने उससे कहा, "क्यों री, तू बकवास किए जा रही है ?" फिर माँ से बोला, "माँ मैं तुम लोगों का झगड़ा पसंद नहीं करता। अगर तुम्हें चाहिए तो सारे जेवर ले जाओ ।" मंगम्मा बोली, "माँ जी रास्ता चलने वाले भी इस तरह से बात नहीं करते। 'चाहिए, तो जेवर लेकर चली जाओ' कहकर उसने सारा दोष मुझ पर ही मढ़ दिया। अब यह जन्म किसलिए ?" यह सुनकर मुझे बड़ा दुख हुआ। वह भी इसलिए कि बुढ़िया ने अपने पोते को पीटने से मना किया था। भला यह सब क्या हो रहा है। बात मुझे बाद में समझ में आई जहाँ भी देखो झगड़े का कारण ऐसा ही होता है। जब कोई एक दूसरे की पसंद नहीं करता तब छोटी बातें भी बड़ी हो जाती हैं। बेकार के झगड़े उठ खड़े होते हैं उससे संबंधित सभी लोगों को बहिसाब दुख उठाना पड़ता है।

 

कुछ दिन बाद एक दिन मंगम्मा बोली, "माँ जी आप बहुत भली हैं। मेरे पास थोड़े से पैसे रखे हैं, उसे कहीं बैंक में रखवा दीजिए। उन पर कई लोगों की आँखें लगी हैं।" मैंने पूछा, "ऐसा क्या हो गया ?" वह बोली, "माँ जी कल ही की बात है। हमारे गाँव में रंगप्या नाम का एक आदमी है। वह कभी-कभार जुआ-तआ खेलता है। बड़ा शौकीन नबीयत का है । मैं तब दही लेकर आ रही थी तो कहीं से टपक पड़ा और पूछने लगा, "क्यों मंगम्मा अच्छी तो हो ।' मैंने कहा, 'क्या अच्छा क्या बुरा, जो है तुम्हें पता नहीं ?" वह बोला, "हाँ भाई तुम्हारा कहना ठीक है । आज के जमाने में भला कौन सुखी है, आजकल के लड़कों की जवान का क्या ठिकाना ? हमारी उमर के लोगों को तो बस देखते रहना ही पड़ता है। और कर भी क्या सकते हैं ?" वह वैसे ही साथ चला आया । रास्ते में अमराई का कुआँ है । वहाँ से गुजरते समय मुझे डर सा लगा, मैं सोचने लगी, पता नहीं यह क्या कर डाले ? अंटी में काफी पैसे थे। कहीं इसी के लिए तो पीछे-पीछे नहीं आया है वही बोला, "जरा चूना दोगी ?" मैंने दे दिया, वह लेकर चला गया। आज भी आते समय वहीं आकर मिला। माँ जी! इधर-उधर की बातें करता करता बीच में बोला, "मंगम्मा, मैं जरा तकलीफ में हूँ। थोड़ा सा कर्ज दोगी ? इस बार रागी बेचते ही लौटा दूँगा ।"मैं बोली, "अरे भैया, मेरे पास पैसे कहाँ ?" तब वह कहने लगा, "जाने दो मंगम्मा ! क्या हमें पता नहीं ? पैसे को यहाँ वहाँ गाड़कर रखने से भला क्या मिलता है ?" फिर थोड़ी देर बाद वहीं बोला, "तुम्हारा बेटा तुम्हारे साथ रहता तो मैं तुमसे कर्ज नहीं माँगता । मैं जानता हूँ, तुम अपनी बहू के लिए कोई न कोई चीज वस्त बनवाती रहती थी। अब वह बात तो नहीं रही ।" देखिए माँ जी, औरत अगर अकेली हो जाती है तो लोगों की आँखें उसकी तरफ लग जाती है ।

 

मैंने मंगम्मा से कहा, "मैं अपने घरवाले से पूछकर बताऊँगी।" मैंने उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की दूसरे दिन मंगम्मा ने दही लेने के बाद अंटी से एक थैली निकाली और कहने कलगी, "माँ जी, ज़रा भीतर चलो गिन लो ।" मैं बोली, "मैंने अभी उनसे पूछा नहीं । अभी रखे रहो, फिर ले आना ।" मंगम्मा कहने लगी, "मुझे बहुत डर लगता है माँ जी । आज भी रंगप्पा आया था, अमराई के पास तक कहने लगा जरा बैठो मंगम्मा, ऐसी जल्दी क्या है ? मेरे पास ये पैसे भी थे। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। अगर मैं नहीं रुकती तो वह जबरन बाँह पकड़कर बिठा लेता। इस डर से बैठ गई वह दुनिया-जहान की बातें करता रहा। बाद में मेरा हाथ पकड़कर बोला, 'मंगम्मा तुम कितनी अच्छी हो ।' जवानी में भी घरवाले ने मेरा इस तरह हाथ नहीं पकड़ा था। बाद में भी किसी और ने इस हाथ को नहीं पकड़ा। आज इसने आकर पकड़ा।

मैंने हाथ छुड़ा लिया और पूछा- क्या बात है, रंगप्पा आज बड़े रंग में हो। मेरा अच्छापन देखने को तुम मेरे घरवाले हो क्या कहते हुए उठकर तेजी से चली आई। माँ जी. कल उसने पैसे माँगे थे आज उसने पान माँगा जिसने मड़व के तले बैठकर और बाँध कर गठबंधन करके हाथ धामा, वह तो कभी का चला गया। भरी जवानी में घरवाले ने मुँह मोड़ लिया। कोई और होती तो यह सोचकर खुश हो जाती कि घरवाले ने तो पसंद नहीं किया पर कोई तो पसंद करने वाला मिला। पर मैंने अपना धरम नहीं छोड़ा। इस बदमाश ने आकर मेरा हाथ घरवाले से भी ज्यादा हक से पकड़ लिया था ।"

मुझे लगा कि बेचारों का जीवन बेकार में ही दुखी होता जा रहा है। इसलिए मैंने कहा,

"यह सब फजीहत काहे का मंगम्मा ? चुपचाप जो हुआ उस पर मिट्टी डालकर बेटे के साथ रह क्यों नहीं जाती ?"

"मैं तो रह जाऊँगी माँ जी। पर वह रहने दे तब न ?"

"बेटे से यह सब बता दो।"हाय राम, हो-हल्ला करके मेरी बहू तो मुझे जाति से हो बाहर कर देगी। मुझे देर हो माँ जो चलती हूँ। कल अपने उनसे पूछकर रखिएगा ।" कहकर मंगम्मा चली गई ।

 एक घंटे बाद फिर आकर बोली, "माँ जो आज एक बात हो गई ।

"  'क्या ?"

"बच्चे के लिए थोड़ी-सी मिठाई लेकर टोकरे में रख ली थी ।" मगम्मा ने पहले हो बताया था कि उसके पोते को उसके पास वह आने नहीं देतो, इसलिए मुझे यह समझ में न आया कि बच्चा कौन सा है। मैंने पूछा, "किस बच्चे के लिए 'और कौन-सा बच्चा माँ जी ? मेरा पोता ही तो " " "तुम्हीं ने तो कहा था, वे तुम्हारे पास नहीं आने देते

"उसकी माँ तो मना करती है पर बच्चा क्या रुक सकता है ? आँख बचाकर आ ही जाता है। कभी-कभी जरा दूध पी जाता है, कभी दही माँग लेता है। थोड़ा सा कुछ मिल जाने पर 1 नाच उठता है। जरा भी शोर मचाता है तो 'तेरी माँ सुन लेगी' कहते हो चुप हो जाता है। बच्चों का खेल हो तो असली खेल है। उसी के लिए थोड़ी-सी मिठाई लेकर रखी थी। वह सुकापुर है न, उधर से आ रही थी। वहाँ एक आम का पेड़ है न, उस पर बैठा एक कौआ झट से मिठाई की पुड़िया उठा ले गया। आज कैसी अजीब बात हो गई ?" "एक मिठाई की पुड़िया चली गई तो क्या हो गया ? फिर से खरीद लो ।"

"यह बात नहीं माँ जी। कहते हैं कि कौवे से आदमी का स्पर्श नहीं होना चाहिए । इसीलिए कहा ।" "उससे क्या होता है ? " कहते हैं उससे जान का खतरा हो जाता है। मुझे लगा कि मेरे दिन पूरे हो चले। बाद में यह सोचकर खुशी भी हुई कि चलो अच्छा हुआ। यह जन्म किसी को भी नहीं चाहिए। अच्छा है जल्दी से भगवान के चरणों में पहुँच जाऊँगा। जो भी हो आज ही हो।“

 

"तुम भी कैसी पागलपन की बातें कर रही हो ? पहले तो कौवे को आसानी से मिठाई मिल जाए ऐसे रखकर लाओ, अगर वह उठा ले जाए तो कहो कि जान का खतरा । यह कौन सी अकल की बात है । जाओ चुपचाप घर जाओ ।"

 

"तो आप का यह कहना है कि कोई डर नहीं है ?" 'डर वर कुछ भी नहीं, जितना झगड़ा होता है, उमर बढ़ती है। दुबारा उस बारे में मत सोचो, हँसते हँसते घर जाओ ।"

 

मंगम्मा चली गई। मैं उसकी मानसिक स्थिति सोचकर आश्चर्यचकित हुई। बेटा चाहिए, बहू चाहिए, पांता चाहिए, साथ ही वह घर की बड़ी है यह लालसा छूटी नहीं। जीवन के प्रति एक विचित्र सी ऊब फिर भी मरने की इच्छा नहीं और अनिच्छा प्रकट करने का मन भी नहीं। हम सोचते हैं, ये गाँव के लोग हैं, कुछ जानते नहीं, कोई लुकाव छिपाव नहीं। तो भी लोगों की मानसिक स्थिति के पीछे परतों पर परतें हैं। बड़े घर में छोटा घड़ा समाया है । मैंने सोचा यह कसा नाटकीय सूत्र है । मंगम्मा जब फिर से घर आई तो उसने एक समाचार दिया। अब पोता अपने माँ-बाप को छोड़कर उसके पास आ गया है। वह बहुत खुश थी। उसके साहस की प्रशंसा करते हुए बोली, "बित्ने भर का छोरा है। माँ को छोड़कर चले आने का मतलब क्या है ? कल दोपहर को आए लड़के ने कह दिया फिर से माँ के पास नहीं जाऊँगा इसे दिन चोरी-चोरी आया करता था जब वह घर नहीं पहुंचा तो माँ ने आकर शोर मचाया, पीटने की धमकी दी । 'मैं नहीं जाऊंगा' कहकर वह मेरी टाँग पकड़कर खड़ा हो गया और कोई चारा न देखकर मैंने कहा, 'जा बेटा'। उसके बाप ने भी आकर बुलाया, पर 'मैं नहीं जाऊंगा' कहकर वह मेरे पास हो रह गया माँ जी। दस दिन से अकेले घर में सोती थी जरा डर भी लगता था। जो भी हो मर्द का बच्चा है। देखो, भगवान ने उसको कैसी अकल दो जवान बेटे ने मुँह मोड़ लिया और यह बित्ने भर का पोता, 'मैं तो हूँ, तुम चिंता मत करो' कहकर आ ही गया । बहू ने तो सारी रात महाभारत मचाया। ' 'लाख जोर लगाने पर भी वह नहीं गया। सुबह यहाँ आते समय 'तू अकेला कैसे रहेगा' कहकर उसे उसकी माँ के दरवाजे पर ले जाकर खड़ा किया। जब वह भीतर चला गया तब में यहाँ आई । “

 

'अब अगर वह बच्चे को पीटे तो क्या करोगी " अरे माँ जी, क्या उसे इस बात की खुशी नहीं होगी कि बेटा एक बार तो घर आया है ? पास रहे तो मारने को मन करता है ? देखो माँ जो जब हम इकट्ठे थे तब मुझे कभी यह नहीं लगा कि मेरी वह सुंदर है। अब दूर से देखती हूँ तो उसको भौंह चढ़ी ही रहती हैं- वैसे - बड़ी सुंदर दिखाई देती है। इसीलिए तो मेरा बेटा उस पर लट्टू है। वह भी ऐसा ही है तब यहपता नहीं चलता था कि कब घर आता है और कब खेत पर जाता है। अब मैं घर के दरवाजे पर बैठी यह देखती रहती हूँ। इतनी जल्दी क्यों चला गया ? इतनी देर तक क्यों नहीं आया ? माँ जो उसे भी तो ऐसा ही लगता होगा न ? यदि वह पीटेगी तो कल दही बेचने निकलेगी तो 1 मेरे साथ ही चला आएगा, नौ महीने पेट में रखकर, पौर सहकर पैदा किए बच्चे को छोड़ देंगी ?" मुझे यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि वह कितनी दूर तक सोचती है। मुझे लगा कि कुछ दिनों में उनका झगड़ा निवट जाएगा और सभी सुखी रहेंगे हुआ भी ऐसा ही दो दिन बाद लड़का माँ के पास गया पर उसके दूसरे दिन ही दादी के साथ 'में भी बेंगलूर जाऊंगा' कहकर जिद पकड़ लो। बेचारी बुढ़िया के लिए सिर पर दही की मटकी वाला टोकरा और गोद में पोते को लेकर तीन मील चलना असंभव था। उसको समझ में न आया कि क्या करे ? बेटे और बहू ने आकर समझाया, "उस दिन हमसे गलती हो गई । तुम भी गुस्सा करके यूँ रहोगी तो कैसे चलेगा माँ।" गाँव के चार बड़े बूढ़ों ने भी उस समझाया । वह भला क्यों अपना बड़प्पन खोती ? मंगम्मा अपनी इच्छा से ही फिर खुशी-खुशी अपनी बहू के साथ रहने लगी परंतु पोता तो दादी के पास ही रहने की जिद पकड़ बैठा था । इसलिए एक नया प्रबंध शुरू हुआ। शुरू से ही दूध-दही का व्यापार मंगम्मा के हाथ में था। बहू के आने पर भी मंगम्मा ने उसे अपने हाथ में ही रखा। जब कोई बहू बनकर आती है तो घर के खाने पकाने की जिम्मेदारी भी उस पर पड़ती है। वास्तव में बात यह थी कि दही बेचने पर चार पैसे हाथ आते थे। अब पोते ने सदा दादी के पास रहने की हठ पकड़ी थी। वह बोली, "इतनी धूप में इस उमर में तुम क्यों बाहर जाती हो। भला कितने दिन यह काम कर सकोगी। घर में ही खाना-पीना बनाकर मालकिन की तरह रहो । दही बेचने का काम मैं देख लेती हूँ ।" "ठीक है ।" कह दिया। साथ ही यह भी कहा कि "कभी-कभार में चली जाऊँगी रोज जाने का काम तुम्हीं करो ।" एक दिन सास वह दोनों आई एक की गोद में बच्चा था। दूसरों के सिर पर मटकी वाला टोकरा, "यही है माँ जो मेरी बहू। बुढ़िया बेचारी अकेली क्यों रहे, सोचकर इसने फिर से मुझे अपने साथ बुला लिया। साथ ही यह भी कहा कि तुम बेकार में धूप में मत घूमो। मैंने भी मान लिया है। आगे से यही दही बेचने आएगी।" यह बताकर मंगम्मा ने बहू को हमें दिखा दिया। मैंने सास और बहू से बात करके और संयम से काम लेना चाहिए कहकर, दो बातें अकल की समझाकर, दोनों को पान- है । न-सुपारी देकर भेज दिया । आजकल वह बहू ही दही लाया करती है।

सास के बारे में इतना सब सुना, अब वह क्या कहती है, यह जानने की उत्सुकता मुझे हुई। इसलिए एक दिन मैंने कहा, "अरी, नंजम्मा तू तो बड़ी समझदार है। पर क्या सास को निकाल देना ठीक है ?"

सास को निकाल देने में क्या है माँ जाने का मतलब बात उनको ही रखनी चाहिए क्या अपने बेटे को भी तो वह नाम नहीं हो जाएगा यह मेरा परवाता है, मैं उसकी पत्नी हूँ। भला में पर कैसे चलाऊँ ? यह ठीक है कि उन्होंने जन्म दिया, पाला-पोसा तो ही अपने बेटे पर अपना हक रखें। में चुप रहूंगी। पर मैं अपने बेटे को भी मार नहीं सकती ? तो मैं कहाँ की रही ?'

 

बेटा तुम्हारा मारना, प्यार करना तो चलता है, पर जब मारने पर पूछती कि क्या मारती है, तब प्यार करने पर क्यों नहीं पूछती इसलिए इन सबसे कौन माथापच्ची करे मेरा बेटा 'मेरा' है। मेरा पति मेरा होना चाहिए बहू होकर में अगर एक बात न कह सके, एक थप्पड़ न लगा सक तो मेरा घर चलाना किस काम का ?" मुझसे मंगम्मा ने जब अपनी बात सुनाई थी, तब लगा था कि उसकी बात ह । अब इसने अपनी बात कही तो लगा इसकी बात भी सही है। मैंन पूछा, "तो अब तुम्हें घर में कुछ छूट मिली ?"

" अब पहले से जरा ठीक है, जो भी हो जरा संभलकर चलना ही पड़ता है। अगर झगड़ा तो मेरी सास पता नहीं किसे सारे पैसे दे डाले हमारे गांव में रंगप्पा नाम का एक आदमी है जब मेरी सास अलग थी तब उसने मेरी सास से कर्ज मांगा। वह देने को तैयार हो गई थी। रंगप्या से हो पता चला था। तब मैंने बच्चे को सिखाया तू अपनी दादी के पास चला जा वह मिठाई देती है। हमारे घर कदम मत रखना। झगड़ा किसी तरह निपटाने को मैंने यह सब किया माँ जी

"तो पोता दादी के पास अपने आप नहीं गया ?" "बच्चा भी गया, मैने भेज भी दिया माँ जो यह सब बताने की बातें थोड़े ही हैं । आदमी लोग यह सब कहाँ समझते है ?" मुझे ऐसा लगा कि गम्मा भी अक्ल से कुछ कम नहीं। उस घर में अब सास और बहू में स्वतंत्रता को होड़ लगी है। उसमें मां-बेटे और पति-पत्नी हैं। माँ बेटे पर से अपना हक नहीं छोड़ना चाहती, यह पति पर अधिकार जमाना चाहती है। यह सारे संसार का ही किस्सा है। इसकी हार-जीत क्या होगी यह कहा नहीं जा सकता। पानी में खड़े बच्चे का पाँव खींचने वाले मगरमच्छ की मी दशा यह की है; ऊपर से बाँह पकड़कर बचाने की-सी दशा माँ की है। बीच- में बच्चे का चष्टा करने वाल को कष्ट होता है। गांव में यह बात दही बेचने वाली मम्मा के घर में है तो शहर में दही लेने वालों मगम्मा के घर में भी है। यह नाटक चलता ही रहता है। इस नाटक का कोई अंत नहीं है

 

 

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